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"अंधी"

Updated: Apr 14, 2025

नाराज़ और ख़फ़ा रहता हूँ तुमसे मैं आज कल

तुम दिल मेरा जब मन चाहे तोड़ जो देती हो

पर शिकायत भी क्या करू तुमसे

आख़िर ये टूटा दिल कभी तुम्हीं ने जोड़ा था


क्यों तुम गैरो को मुझसे ज्यादा मानती हो?

किसने क्या किया क्या, नहीं किया, क्या तुम ये नहीं जानती हो?

कभी हिसाब भी लगा लिया करो सबके एहसानो का

उस कागज पे सबसे ऊपर तुम मेरा नाम ही पाओगी


याद है वो मनहूस रातें

जब तुम मेरे पास आके रोया करती थी?

किसी ने तोड़ दिया था दिल तुम्हारा

ये बता के तुम मेरा दिल तोड़ने आई थी


मैं फिर भी खामोश रहता था

सोचता था कि किसी दिन तो उस अंधी को झलकेगा प्यार मेरा

पर मैं उसकी आँखों का चश्मा बन के रह गया था

उसे मेरे सिवा सब दिखता था..


~ विशाल

1 Comment


Alok Kumar Singh
Alok Kumar Singh
May 10, 2025

Last line is 🔥 🔥

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